ये राजस्थान की वही कांग्रेस सरकार जो भाजपा के कार्यकाल में नेटबंदी होने पर कहती आई कि इस तरीके से इंटरनेट बंद करना गलत है, सरकार को इसमें कोई और रास्ता अपनाना चाहिए। लेकिन अयोध्या मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद जिस तरीके से राजस्थान के कई जिलों में नेटबंदी की गई वो ये दर्शाता है कि हमारी सरकारों के पास साइबर एक्सपर्ट की भारी कमी है। जिसके चलते है सरकार नेटबंदी जैसे ऐसी फैसले ले लेती है जिससे प्रदेश के व्यापारियों को धंधे में भारी आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ता है। इसके साथ ही प्रदेश आने वाले प्रयटकों को खासा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। प्रदेश के 34 में से 32 सर्किलों में माेबाइल इंटरनेट ठप रहा। दो दिन में तकरीबन एक लाख लोग ओला-उबर कैब बुक नहीं कर पाए। 7 हजार लोग जोमैटो व स्विगी से ऑर्डर नहीं कर पाए। पेटीएम, फोनपे, गूगल पे जैसे ई-वॉलेट और नेट बैंकिंग बंद होने से ऑनलाइन पेमेंट और शॉपिंग भी नहीं हो सकी।

इंटरनेट बंद हाेने से एयरपोर्ट पर बाहर खड़े कार और टैक्सी ड्राइवरों ने चार गुना तक पैसे वसूले। रात के समय कार टैक्सी और ऑटो रिक्शा ने किराया दोगुना कर दिया। कई पेट्राेल पंपों पर एटीएम कार्ड स्वाइप नहीं हुए। जिसका ख़मियाजा प्रदेशवासियों को उठाना पड़ा। मोबाइल एप पूरी तरह बंद होने की वजह से शहरवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। रविवार को भी पूरे दिन फेसबुक, व्हाट्सएप और यू-टयूब सहित सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफार्म नहीं चल सके।

फर्स्टपोस्ट न्यूज़ वेबसाइट के मुताबिक नेट पर पाबंदी लगाकर नागरिकों की संविधान से मिली अभिव्यक्ति की आजादी छीनने में जम्मू-कश्मीर और राजस्थान का देश मे कोई सानी नहीं है। राजस्थान इंटरनेट पर पाबंदी लगाने के मामले में देश के 27 राज्यों से आगे है। यानी वह सिर्फ जम्मू कश्मीर से पीछे है।

वहीँ दूसरी और देखने मे आ रहा है कि जरा से विपरीत हालात होते ही पुलिस प्रशासन ने इंटरनेट के शटडाउन को ही कानून व्यवस्था बनाए रखने का अंतिम हथियार बना लिया है।

हर बवाल पर इंटरनेट बैन क्यों?
सवाल ये है कि हर छोटी मोटी घटना के बाद इंटरनेट पर पाबंदी क्यों लगा दी जाती है? पुलिस सूत्रों के अनुसार, असामाजिक तत्व किसी भी घटना से जुड़ी अफवाह फैला कर माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। जिसमें उन्हें मोबाइल इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स से बड़ा सहयोग मिलता है। इंटरनेट के व्यापक प्रसार और स्मार्टफोंस की बढ़ती संख्या के बाद ऐसा करना आसान भी हो गया है। एक गलत मैसेज व्हाट्सएप्प ग्रुप्स में वायरल कर दिया जाता है और मिनटों में सड़कों पर भीड़ इकठ्ठा हो जाती है।

बीजेपी वाले राज्यों में ज्यादा है बैन!
फर्स्टपोस्ट न्यूज़ वेबसाइट के मुताबिक ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ राजस्थान में हो रहा हो. SFLC के अनुसार, इंटरनेट को सस्पेंड करने की शुरुआत सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में हुई. पिछले 5 साल में ऐसी कोशिशें सबसे ज्यादा वहीं पर हुई हैं, करीब 53 बार. हरियाणा में 11 बार ऐसा किया जा चुका है. गुजरात में भी 10 बार यही देखा गया है. आजादी पर पाबंदी की इन कोशिशों से जुड़ा एक तथ्य और भी चौंकाने वाला है. इंटरनेट पर सबसे ज्यादा पाबंदी लगाने वाले राज्यों में सबसे ऊपर वो हैं, जहां बीजेपी की सत्ता है. जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात ऐसे ही कुछ राज्य हैं।

निजता के अधिकार पर तो खुद सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ऐतिहासिक फैसला दिया है। इसके बावजूद देखने में आ रहा है कि विरोध/विपक्ष की आवाज दबाने के लिए सत्ता नित नए फॉर्मूले ला रही है। इसके बावजूद छोटे मोटे विवादों से निबटने के लिए स्वतंत्रता का हनन यानी इंटरनेट पर पाबंदी का सहारा लिया जाना आम होता जा रहा है। जबकि इसके साइड इफ़ेक्ट भी कम नहीं हैं।

जानकारों के मुताबिक, भारत की GDP में इंटरनेट का योगदान 5.5% से ज्यादा है। 2016 में शटडाउन से अर्थव्यवस्था को 6,000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ। आर्थिक-व्यापारिक हानि के अलावा पत्रकारों, छात्रों और मरीजों और पर्यटकों को भी खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

इंटरनेट का सस्पेंशन, हिंसा और सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगड़ने से रोकने का एकमात्र उपाय भी नहीं है। इसके बजाय दक्षिण भारतीय राज्यों से सबक लिया जा सकता है। जैसे कि कावेरी जल विवाद के दौरान बेंगलुरु पुलिस ने शांति बहाली के लिए सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया। मुम्बई के पूर्व कमिश्नर राकेश मारिया ने भी अपनी किताब में बताया है कि कैसे सांप्रदायिक हिंसा की आशंका वाली कुछ एक घटनाओं में इंटरनेट और सोशल मीडिया सहायक बना। वहीँ एक रास्ता राज्यों में इंटरनेट बैन के बजाये घंटो के हिसाब सोशल मीडिया एप और वेबसाइट को बैन कर के भी निकाला जा सकता है।

आज इंटरनेट भावनाओं को व्यक्त करने का साधन ही नहीं बल्कि जिंदगी की जरूरत बन चुका है। फिर भारत को डिजिटल इंडिया में ट्रांसफॉर्म करने के प्रयासों में क्या इंटरनेट पर बढ़ती पाबंदी रोड़ा नहीं है?

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